श्रीवैशम्पायन उवाच —
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ ७॥
śrī vaiśaṃpāyana uvāca:
śrutvā dharmnāśeṣeṇa pāvanāni ca sarvaśaḥ,
yudhiṣṭhiraḥ śāntanavaṃ punarevābhyabhāṣata. (7)
श्री वैशम्पायन ने कहा: सम्पूर्ण पवित्र धर्म सुनने के पश्चात् युधिष्ठिर ने शान्तनु-पुत्र भीष्म से पुनः कहा।
श्री युधिष्ठिर उवाच —
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ ८॥
śrī yudhiṣṭhira uvāca:
kimekaṃ daivatam loke kim vāpyekaṃ parāyaṇam,
stuvantaḥ kaṃ kamarcantaḥ prāpnuyurmānavāḥ śubham. (8)
युधिष्ठिर ने पूछा: इस लोक में एकमात्र सर्वोच्च देवता कौन हैं? किस एकमात्र सत्ता में सर्वोच्च शरण है? किसकी स्तुति और पूजा करने से मनुष्य शुभ को प्राप्त होते हैं?
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जप्नुमुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ९॥
ko dharmaḥ sarvadharmāṇāṃ bhavataḥ paramo mataḥ,
kiṃ japanmuchyate janturjanmasaṃsārabaṃdhanāt. (9)
आपकी दृष्टि में समस्त धर्मों में सर्वोच्च धर्म कौन-सा है? किसका जप करने से प्राणी जन्म-संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है?
श्री भीष्म उवाच —
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ १०॥
śrī bhīṣma uvāca:
jagatprabhuṃ devadeva-manantaṃ puruṣottamam,
stuvannāmasahasreṇa puruṣaḥ satatotthitaḥ. (10)
भीष्म ने उत्तर दिया: जो पुरुष सदा जागरूक रहते हुए एक हज़ार नामों से ब्रह्माण्ड के स्वामी, देवों के देव, अनन्त, पुरुषोत्तम की स्तुति करता है —
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।
ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ११॥
tameva cārcayannityaṃ bhaktyā puruṣamavyayam,
dhyāyan stuvan namasyaṃśca yajamānastameva ca. (11)
— जो भक्तिपूर्वक उस अविनाशी पुरुष की ही नित्य अर्चना करता है, उनका ध्यान करता है, स्तुति करता है, नमन करता है और यज्ञ करता है —
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ १२॥
anādinidhanam viṣṇuṃ sarvalokamaheśvaram,
lokādhyakṣaṃ stuvannityaṃ sarvaduhkhātigo bhavet. (12)
— जो अनादि-अनन्त विष्णु को, समस्त लोकों के महेश्वर और अध्यक्ष को, सदा स्तुति करता रहता है — वह समस्त दुःखों से परे हो जाता है।
ब्राह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ १३॥
brahmanyaṃ sarvadharmajñaṃ lōkānāṃ kīrtivardhanam,
lōkanāthaṃ mahadbhūtaṃ sarvabhūtabhavodbhavam. (13)
वे ब्राह्मणों के मित्र हैं, समस्त धर्मों के ज्ञाता हैं, लोकों की कीर्ति को बढ़ाने वाले हैं, लोकों के नाथ हैं, महान् और विशाल हैं, समस्त प्राणियों के उद्गम-स्रोत हैं।
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चन्नरः सदा ॥ १४॥
eṣa me sarvadharmāṇāṃ dharmo'dhikatamo mataḥ,
yadbhaktyā puṃdarikākṣaṃ stavairarchennaraḥ sadā. (14)
मेरे मत में यही समस्त धर्मों में सर्वश्रेष्ठ धर्म है: कि मनुष्य कमलनयन प्रभु की भक्तिपूर्वक और स्तोत्रों से निरन्तर अर्चना करे।
परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ १५॥
paramaṃ yō mahattejaḥ paramaṃ yō mahattapaḥ,
paramaṃ yō mahadbrahma paramaṃ yaḥ parāyaṇam. (15)
वे जिनका तेज परम महान् है, जिनकी तपस्या परम महान् है, जो परम महाब्रह्म हैं, सर्वोच्च परम लक्ष्य हैं।
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १६॥
pavitrāṇāṃ pavitraṃ yō maṃgalānāṃ cha maṃgalam,
daivataṃ daivatānāṃ cha bhūtānāṃ yo'vyayaḥ pita. (16)
पवित्रों के पवित्र, मंगलों में परम मंगल, देवों के देव, समस्त प्राणियों के अविनाशी पिता।
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ १७॥
yataḥ sarvāṇi bhūtāni bhavantiyādiyugāgame,
yasmiṃśca pralayaṃ yānti punareva yugakṣaye. (17)
जिनसे कल्प के आरम्भ में सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिनमें कल्पान्त पर पुनः विलीन हो जाते हैं।
तस्य लोकप्रधानेन जगन्नाथेन भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १८॥
tasya lōkapradhānena jagannāthen bhūpate,
viṣṇōrnāmasahasraṃ me śṛṇu pāpabhayāpaham. (18)
हे राजन्! विष्णु के — लोकों के प्रधान, जगत् के नाथ के — उन हज़ार नामों को सुनिए जो पाप और भय का नाश करते हैं।
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १९॥
yāni nāmāni gauṇāni vikhyātāni mahātmanaḥ,
ṛṣibhiḥ parigītāni tāni vakṣyāmi bhūtaye. (19)
उन महात्मा के वे प्रसिद्ध गुणवाचक नाम जिन्हें ऋषियों ने गाया है, उन्हें मैं सबके कल्याण के लिए कहूँगा।
ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ।
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ २०॥
ṛṣirnāmnāṃ sahasrasya vedavyāso mahāmuniḥ,
chamdōnuṣṭup tathā devō bhagavān devakisutaḥ. (20)
इस सहस्रनाम स्तोत्र के ऋषि महामुनि वेदव्यास हैं; छन्द अनुष्टुप है; देवता भगवान देवकी-पुत्र हैं।
अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः ।
त्रिसाम हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते ॥ २१॥
amṛtāṃśūdbhavo bījaṃ śaktirdevakinamdanaḥ,
trisāma hṛdayaṃ tasya śāntyarthe viniyujyate. (21)
"अमृत-किरण चन्द्रमा से उत्पन्न" इसका बीज है; "देवकी-पुत्र" इसकी शक्ति है; "तीन सामगानों द्वारा स्तुत" इसका हृदय है — शान्ति के उद्देश्य से इसका विनियोग होता है।