कहानी

मोहिनी एकादशी की कथा

कूर्म पुराण से

लेखक रुबल शर्मा·26 अप्रैल 2026·12 मिनट का पठन

युधिष्ठिर महाराज ने भगवान जनार्दन के चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पूछा — “हे प्रभु, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उसे विधिपूर्वक कैसे मनाया जाए? और उसके पालन से क्या फल मिलता है? कृपया मुझे सब कुछ विस्तार से बताइए।”

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर की ओर देखा और मंद मुस्कान के साथ बोले — “हे धर्मपुत्र, जो कथा महर्षि वशिष्ठ ने कभी साक्षात् भगवान राम को सुनाई थी, वही आज मैं तुम्हें सुनाता हूँ। ध्यान से सुनो।”

एक बार भगवान श्रीराम ने अपने गुरु वशिष्ठ मुनि से कहा था — “हे गुरुश्रेष्ठ, माता सीता के वियोग में मैं बहुत काल से कष्ट भोग रहा हूँ। कृपया मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो सभी पापों और दुखों का नाश करे। कोई ऐसा उपाय जो मेरे कष्टों को दूर कर सके।”

वशिष्ठ मुनि ने प्रसन्न होकर कहा — “हे रामचंद्र, आपका प्रश्न अत्यंत उत्तम है। आपके नाम के स्मरण मात्र से मनुष्य इस संसार सागर को पार कर लेता है। फिर भी आपने यह प्रश्न समस्त मानवजाति के कल्याण के लिए पूछा है — यह आपकी महानता है। सुनिए, मैं आपको उस एकादशी के बारे में बताता हूँ जो समस्त संसार को पवित्र करती है।”

“हे राम, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका नाम है — मोहिनी एकादशी। यह एकादशी मोह के जाल से मुक्त करती है। इसके व्रत के प्रभाव से सौभाग्यशाली जीव माया के बंधन से छूट जाता है। इसलिए यदि आप अपने कष्टों का अंत चाहते हैं तो इस पावन एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करें। यह व्रत सभी बाधाओं को दूर करता है और महादुखों से मुक्ति देता है। इसकी महिमा सुनने मात्र से भी महापाप नष्ट हो जाते हैं।”

फिर वशिष्ठ मुनि ने भगवान राम को एक कथा सुनाई —

भाग एक — धनपाल और उसके पाँच पुत्र

सरस्वती नदी के पावन तट पर एक सुंदर और समृद्ध नगर था जिसका नाम था भद्रावती। वह नगर जितना सुंदर था, उतना ही सुव्यवस्थित भी था। वहाँ के राजा का नाम था द्युतिमान — चंद्रवंश में जन्मे, सत्यनिष्ठ, बुद्धिमान और न्यायप्रिय। उनके राज में धर्म का पालन होता था, प्रजा सुखी थी और किसी को किसी बात का अभाव नहीं था।

उस नगर में एक महान वैश्य रहते थे जिनका नाम था धनपाल। नाम के अनुरूप ही उनका जीवन था। धन की कोई कमी नहीं थी — अन्न के भंडार सदा भरे रहते, सोने-चाँदी की कोई गिनती नहीं थी। लेकिन धनपाल केवल धनवान नहीं थे — वे मन, वचन और कर्म से पुण्यात्मा थे।

उन्होंने नगर के लिए तालाब खुदवाए ताकि प्यासे पशु-पक्षी और राहगीर पानी पी सकें। यज्ञशालाएँ बनवाईं ताकि देवताओं की पूजा-अर्चना विधिवत् हो सके। सुंदर बगीचे लगवाए जहाँ हर नागरिक छाया में बैठकर थकान मिटा सके। धर्मशालाएँ बनवाईं ताकि यात्रियों को आश्रय मिले। वे भगवान नारायण के परम भक्त थे — उनका हर कदम धर्म की दिशा में उठता था।

ईश्वर की कृपा से धनपाल के पाँच पुत्र थे — सुमन, द्युतिमान, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि। पहले चार पुत्र अपने पिता की छाया की तरह थे — विनम्र, कर्तव्यनिष्ठ, संयमी और धर्मपरायण। लेकिन पाँचवाँ पुत्र धृष्टबुद्धि जैसे किसी और ही मिट्टी से बना था।

उसका नाम ही उसका स्वभाव था — धृष्ट अर्थात् निर्लज्ज और बुद्धि अर्थात् मन। वह मनुष्य जिसकी बुद्धि निर्लज्जता में डूब गई हो।

भाग दो — पतन की गहरी खाई

धृष्टबुद्धि ने जीवन को एक उत्सव समझा — लेकिन वह उत्सव था विनाश का। जब पिता पूजा-पाठ में लगे होते, वह जुए की मेज पर बैठा होता। जब भाई शास्त्र पढ़ते, वह मदिरा के नशे में होता। जब परिवार धर्म के पथ पर चलता, वह अधर्म की गलियों में भटकता।

वेश्याओं के साथ समय बिताना, मांस-मदिरा का सेवन करना, जुआ खेलना, निषिद्ध अन्न खाना — यही उसकी दिनचर्या बन गई थी। देवताओं का अपमान, ब्राह्मणों का तिरस्कार, पितरों को भूल जाना, घर आए अतिथियों की अवहेलना — ये उसके स्वभाव में रच-बस गए थे।

धनपाल की वह संपत्ति जो पीढ़ियों की मेहनत और पुण्य से अर्जित हुई थी — धृष्टबुद्धि ने उसे पानी की तरह बहा दिया। कोई हिसाब नहीं, कोई सोच नहीं, कोई पछतावा नहीं।

धनपाल ने अनेक बार समझाया। प्रेम से भी, कठोरता से भी। आँखों में आँसू लेकर भी और क्रोध में भी। लेकिन धृष्टबुद्धि के कानों तक कोई बात नहीं पहुँचती थी — जैसे उसके भीतर विवेक का द्वार ही बंद हो गया था।

फिर वह दिन आया जिसने सब कुछ बदल दिया। धनपाल उस दिन नगर की एक गली से होकर जा रहे थे। सामने से उन्हें अपना ही बेटा दिखा — एक कुख्यात वेश्या के साथ, बाँह में बाँह डाले, सरेआम, बाजार के बीचोबीच, जैसे उसे किसी की परवाह ही न हो।

बूढ़े पिता का हृदय उस क्षण टूट गया। वर्षों का संचित प्रेम, वर्षों की आशा, वर्षों की प्रतीक्षा — सब एक पल में बिखर गई। उस दिन घर लौटकर उन्होंने धृष्टबुद्धि को घर से निकाल दिया।

भाग तीन — अकेलेपन का अँधेरा

जब पिता का दरवाज़ा बंद हुआ तो मानो सारे दरवाज़े एक साथ बंद हो गए। रिश्तेदारों ने मुँह फेर लिया। पड़ोसियों ने दूरी बना ली। जो मित्र कहलाते थे, वे भी धीरे-धीरे गायब हो गए। नगर में उसकी जो भी साख बची थी, वह धनपाल के नाम पर टिकी थी — और अब वह नाम भी उसके साथ नहीं था।

धृष्टबुद्धि ने बचे-खुचे गहने बेचे। अँगूठियाँ, कंगन, जो भी था। जब तक पैसा था, वेश्या भी साथ रही। फिर पैसा खत्म हुआ — और वह भी चली गई। जाते-जाते उसने भी अपमान के कुछ बोल कहे, जैसे जाने में भी कसर न रह जाए।

वह आदमी जिसने ऐश्वर्य में जन्म लिया था, जिसके पिता ने पूरे नगर के लिए तालाब और धर्मशालाएँ बनवाई थीं — वह अब सड़क पर था। भूखा। अकेला। टूटा हुआ। तब उसने चोरी करना शुरू किया।

राजा के सिपाहियों ने उसे पकड़ा — एक बार नहीं, कई बार। हर बार जब वे जानते थे कि यह धनपाल का पुत्र है, तो उसे छोड़ देते थे। पिता की प्रतिष्ठा अभी भी उसे बचा रही थी — भले ही पिता स्वयं उसे नहीं बचाना चाहते थे।

लेकिन यह कब तक चलता? एक दिन राजा के अधिकारियों का धैर्य समाप्त हो गया। उन्होंने धृष्टबुद्धि को जंजीरों में जकड़ा। सरेआम कोड़े लगाए। और साफ शब्दों में कह दिया — “इस राज्य में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है। अब यहाँ से चले जाओ।”

पिता ने अंतिम बार अपना धर्म निभाते हुए उसे छुड़वाया। और धृष्टबुद्धि नगर के द्वार से बाहर निकल गया — घने जंगल की ओर। पीछे मुड़कर नहीं देखा। देखने के लिए कुछ बचा भी नहीं था।

भाग चार — जंगल में पशु से भी बदतर जीवन

जंगल में धृष्टबुद्धि एक शिकारी बन गया। उसके कंधे पर तरकश था और हाथ में धनुष। वह शेर मारता था, हिरण मारता था, जंगली सूअर और भेड़िए मारता था — जो भी सामने आया। चकोर, मोर, कबूतर, कपोत — वे निर्दोष पक्षी जो केवल अपना जीवन जी रहे थे — उन्हें भी उसने बेरहमी से मारा। प्रतिदिन नए पाप, प्रतिदिन नया बोझ।

हर मृत प्राणी के साथ उसके पापों का पहाड़ और ऊँचा होता जाता था। हर गुजरती रात के साथ उसके भीतर का अँधेरा और गहरा होता था। जंगल में तो वह था ही — लेकिन असली जंगल तो उसके अपने मन में था। पापों का इतना भारी बोझ था कि लगता था इस समुद्र से निकलना अब संभव ही नहीं।

वह सदा व्याकुल रहता था। सदा भयभीत। सदा यही सोचता कि आगे क्या होगा। लेकिन कोई उत्तर नहीं था। केवल जंगल था और उसके अपने कर्मों की परछाईं जो हर कदम पर उसके साथ चलती थी।

भाग पाँच — वह एक क्षण जिसने सब बदल दिया

फिर आया वैशाख का महीना। उस सुबह धृष्टबुद्धि बिना किसी उद्देश्य के जंगल में भटक रहा था — जैसे हर रोज़ भटकता था। न कोई दिशा थी, न कोई लक्ष्य। बस भटकना था।

तभी सामने एक आश्रम दिखा। वह आश्रम उस घने जंगल के बीच किसी अलग ही संसार की तरह था — शांत, पवित्र, जैसे उस स्थान पर हवा भी धीरे-धीरे चलती हो। वृक्षों की छाया गहरी थी, पक्षी मधुर स्वर में बोल रहे थे और एक अलग ही प्रकार की शांति उस स्थान में व्याप्त थी।

यह आश्रम था कौण्डिन्य मुनि का — एक महान और तेजस्वी ऋषि, जो तप और ज्ञान में अपना कोई सानी नहीं रखते थे।

संयोग कुछ ऐसा था कि उस सुबह महर्षि कौण्डिन्य गंगा-स्नान करके अभी-अभी आश्रम की ओर लौट रहे थे। उनके वस्त्र अभी भी भीगे हुए थे। जैसे वे चल रहे थे, उनके वस्त्रों की छोर से पानी की बूँदें टपक रही थीं — एक-एक बूँद जैसे अपने आप में एक तीर्थ हो।

और उन्हीं बूँदों में से कुछ बूँदें — बस कुछ ही बूँदें — उस राह से गुज़रते धृष्टबुद्धि के शरीर पर जा गिरीं। बस इतना हुआ। कोई दिव्य प्रकाश नहीं। कोई आकाशवाणी नहीं। कोई चमत्कार नहीं। केवल एक पवित्र ऋषि के भीगे वस्त्रों की कुछ बूँदें।

लेकिन उन बूँदों में गंगा की पवित्रता थी। उनमें वर्षों की तपस्या की शक्ति थी। उनमें वह कुछ था जो किसी धन से, किसी प्रयत्न से, किसी चतुराई से नहीं पाया जा सकता था। और उसी क्षण धृष्टबुद्धि का अज्ञान टूटने लगा।

जैसे बरसों से आँखों पर पड़ी पट्टी अचानक हट गई हो। जैसे जन्मों से बंद एक खिड़की अचानक खुल गई हो। वह स्पष्ट देख सकता था — अपने आप को, अपने जीवन को, अपने पापों को और उस भारी बोझ को जो उसने स्वयं अपने कंधों पर लाद लिया था।

धृष्टबुद्धि महर्षि के चरणों में गिर पड़ा। हाथ जोड़े, गला रुँधा हुआ था, आँखें भर आई थीं। बोला — “हे महाब्राह्मण! मैंने अपने जीवन में अनगिनत पाप किए हैं। मैंने सब कुछ नष्ट कर दिया — अपना परिवार, अपना नाम, दूसरों का जीवन और अपनी आत्मा। मैं आपसे कोई बड़ी तपस्या नहीं माँग रहा। मैं जानता हूँ कि मैं उसके योग्य भी नहीं हूँ। बस कोई एक उपाय बताइए — जो मेरे जैसे टूटे हुए, पापी मनुष्य के बस में भी हो। मैं पहले से बर्बाद हूँ। बस रास्ता दिखाइए।”

भाग छह — ऋषि का उत्तर

कौण्डिन्य मुनि ने उस टूटे हुए मनुष्य को देखा जो उनके चरणों में पड़ा था। उन्होंने कोई व्याख्यान नहीं दिया। कोई लंबी फटकार नहीं लगाई। कोई उपदेश नहीं दिया। वे बस बोले — शांत स्वर में, स्नेह भरे शब्दों में — “पुत्र, ध्यान से सुन। जो मैं अभी बताने वाला हूँ वह तेरा जीवन बदल देगा।”

उन्होंने धृष्टबुद्धि को मोहिनी एकादशी के बारे में बताया। “इसी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में एक एकादशी आती है। उसका नाम है मोहिनी एकादशी। इस एकादशी में ऐसी अलौकिक शक्ति है कि यह सुमेरु पर्वत के समान विशाल और भारी पापों को भी नष्ट कर देती है। एक जन्म के नहीं — अनेक-अनेक जन्मों के पापों को। केवल एक दिन का सच्चा व्रत। भगवान हरि के प्रति समर्पित एक दिन — और तू मुक्त हो जाएगा।”

धृष्टबुद्धि की आँखों में आँसू आ गए। इतने वर्षों के अँधेरे के बाद, इस घने जंगल में, इस टूटी-फूटी देह के साथ — पहली बार कोई रोशनी दिखी थी। उसने ऋषि के चरण पकड़ लिए और वचन दिया कि वह ठीक उसी प्रकार इस एकादशी का व्रत करेगा जैसा महर्षि बताएँगे।

भाग सात — व्रत और मुक्ति

धृष्टबुद्धि ने अपना वचन निभाया। मोहिनी एकादशी के दिन उसने पूर्ण निष्ठा से उपवास किया। भगवान विष्णु का स्मरण किया। जागरण किया। जितनी भक्ति उसके भीतर थी — चाहे वह कितनी भी अधूरी, कितनी भी कमज़ोर क्यों न हो — उसने उस एक दिन में अपने पूरे हृदय से वह सब उँडेल दी।

और फिर जो हुआ वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। वर्षों का पाप — जुए का, मदिरा का, हत्याओं का, विश्वासघात का, अपमान का, उस जंगल के हर निर्दोष प्राणी का — सब धुल गया। एक-एक पाप। एक-एक दुष्कर्म। सब।

धृष्टबुद्धि का शरीर बदल गया। उसका मुख बदल गया। उसकी आँखों में जो वर्षों से घना अँधेरा था, उसकी जगह एक दिव्य आभा आ गई। वह वही मनुष्य नहीं रहा जो जंगल में भटकता था।

और जब इस देह को छोड़ने का समय आया — वह साधारण मृत्यु नहीं थी। उसे दिव्य देह मिली। सारे बंधन कट गए। सारे अवरोध समाप्त हो गए। सारे कर्मों का लेखा मिट गया। और वह भद्रावती का वह लड़का — जिसे उसके पिता ने घर से निकाला था, जिसे राजा के सिपाहियों ने कोड़े मारे थे, जिसे उसकी अपनी माँ जैसी वेश्या ने ठुकरा दिया था, जो जंगल में पशुओं को मारकर जीता था — भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ पर सवार होकर वैकुण्ठ धाम को गया।

वशिष्ठ मुनि ने यहाँ कथा समाप्त की और भगवान राम से बोले — “हे रामचंद्र, यह मोहिनी एकादशी का माहात्म्य है। इस संसार में इससे श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है।”

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर की ओर देखा और बोले — “हे धर्मराज, इस प्रकार मैंने तुम्हें वह कथा सुनाई जो वशिष्ठ मुनि ने भगवान राम को सुनाई थी। अब सुनो इस एकादशी का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण वचन —”

इस संसार में कोई तीर्थ नहीं — चाहे वह कितना ही पावन क्यों न हो। कोई यज्ञ नहीं — चाहे वह कितना ही विशाल क्यों न हो। कोई दान नहीं — चाहे वह कितना ही उदार क्यों न हो — जो इस एक मोहिनी एकादशी के व्रत से प्राप्त होने वाले पुण्य के सोलहवें भाग के बराबर भी पुण्य दे सके।

श्रीकृष्ण

“और जो व्यक्ति इस मोहिनी एकादशी की कथा को श्रद्धापूर्वक सुनता है — जैसे तुमने अभी सुनी — उसे एक हजार गायों के दान के बराबर पुण्य मिलता है।”

मोहिनी एकादशी का नाम क्यों?

मोहिनी शब्द आता है मोह से। मोह — वह माया जो हमें इस संसार से बाँधे रखती है। धन का मोह। देह का मोह। पद का मोह। सुख का मोह। झूठे संबंधों का मोह। वह अदृश्य डोर जो हमें जन्म-जन्मांतर तक इस चक्र में घुमाती रहती है।

धृष्टबुद्धि का पूरा जीवन मोह था — इंद्रियों का, वासनाओं का, क्षणिक सुखों का। वह मोह उसे गिराता गया, तोड़ता गया, अँधेरे में ले जाता गया।

और मोहिनी एकादशी ने वह किया जो कुछ और नहीं कर सका — उस मोह की जड़ काट दी। उस जीव को उस माया से मुक्त कर दिया जिसमें वह जन्मों से फँसा था। यही इस एकादशी की महिमा है। यही इसका नाम है। यही इसका वरदान है — हर उस मनुष्य के लिए जो सच्चे मन से इसे मनाए।

॥ इति श्री कूर्म पुराणे मोहिनी एकादशी माहात्म्यं सम्पूर्णम् ॥

संस्थापक एवं शिक्षिका

रुबल शर्मा

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीतकार। आध्यात्मिक साधिका।

बचपन से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित, रुबल को अपनी गहरी पुकार ब्रह्म मुहूर्त की निश्चलता में मिली। प्रातःकाल से पहले जागकर प्राचीन श्लोकों का पाठ करते हुए, उन्होंने वह पाया जो आधुनिक संसार ने चुपचाप छीन लिया था: पवित्र ध्वनि के जीवंत स्पंदन, जो सदियों से गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से चले आ रहे हैं।

ब्रह्म मुहूर्त क्लब उसी अनुभूति से जन्मा। एक व्यवसाय के रूप में नहीं, बल्कि एक पवित्र कर्तव्य के रूप में। प्रत्येक श्लोक शब्द-दर-शब्द समझा जाता है, हृदय में अनुभव किया जाता है, और दैनिक साधना में बुना जाता है। यह आधुनिक होने के बारे में नहीं है। यह अपने घर लौटने के बारे में है।

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